Javascript Required अवलोकन - वन एवं वन्य जीव विभाग उत्तर प्रदेश

वन एवं वन्य जीव विभाग,

उत्तर प्रदेश सरकार, भारत

अवलोकन

राज्य के बड़े हिस्से में अधिक विशाल जंगलों का उल्लेख विशाल महाकाव्यों रामायण और महाभारत में भी पाया जाता है।मध्यकालीन समय के दौरान, राजाओं और नवाबों ने अपने निजी उपभोग के लिए खेल रिजर्व के रूप में जंगलों के अधिक सुलभ भाग को अनुरक्षित किया था, लेकिन जंगलों की कार्यप्रणाली को विनियमित करने के कोई गंभीर प्रयास नहीं किए गए थे, खासकर काफी क्षेत्र अभी भी घने प्राकृतिक वनों के रूप में थे जो लोगों की सभी जरूरतें पूरा कर सकते थे।

ब्रिटिश शासन के अंतर्गत, इस राज्य के क्षेत्र का एक हिस्सा 1835 तक बंगाल के हिस्से के रूप में प्रसाशित किया जाता था। जब 1902 में उत्तर पश्चिमी प्रांत बनाया गया तो, अवध और आगरा प्रांतों को मिला दिया गया।1947 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद, टिहरी-गढ़वाल, रामपुर और बनारस की रियासतों को 1949 में उत्तर प्रदेश के साथ विलय कर दिया गया।

उत्तर प्रदेश में वन संरक्षण के इतिहास 1800 में शुरू होता है जब कुमाऊं, देहरादून और तराई के वन क्षेत्र ब्रिटिश शासन के अधीन आ गए।प्रारंभिक दौर में निर्यातकों द्वारा हटाये गये वन उपज के लिए एक छोटा से शुल्क लगाया गया था। 1826 में, साल को काटना कुछ क्षेत्रों में निषिद्ध कर दिया गया था।

1855 और 1861 के बीच, बड़े पैमाने पर कटान रेलवे स्लीपरों के लिए भारी मांग को पूरा करने के लिए किया गया।

कुमाऊं के आयुक्त मेजर रैमसे को, उनके अन्य कार्यों के अलावा पहले वन संरक्षक के रूप में नियुक्त किया गया।उन्होंने बारी-बारी से काम करने की प्रणाली कू शुरूआत की और कटाई से पहले पेड़ों को चिह्नित करने पर जोर दिया। 1867 में उन्होंने साल के जंगलों में आग संरक्षण की शुरुआत की।गोरखपुर जंगलों को साल के लिए जहाज निर्माण की जरूरतों को पूरा करने के लिए किया गया।

जनसंख्या के दबाव के कारण, इस क्षेत्र में बड़े क्षेत्रफल पर जंगलों को काटा गया। 1830 और 1855 के बीच अनेकों अधिवासियों ने जंगली क्षेत्रों पर बस्तियां बना लीं।विंध्य में, प्रारंभिक दौर में धैया कृषि प्रणाली की वजह से काफी विनाश हुआ।1855 तक सरकार ने इन उत्तरी जंगलों के संरक्षण की आवश्यकता महसूस नहीं की थी।

1879 से 1894 के दौरान बंदोबस्त, सीमांकन, ब्लॉक और डिब्बों एवं नए डिवीजनों के गठन के साथ जंगलों का विभाजन किया गया। पहला कार्य योजना प्रभाग 1884 में बनाया गया था। उत्तर प्रदेश में वनीकरण का प्ररंभ 1879 में इटावा जिले के खड्ड क्षेत्र की ब्रांडिस की यात्रा के परिणामस्वरूप शुरू किया गया।वर्ष 1886-1900 के दौरान चकराता और नैनीताल के चीड़ देवदार के जंगलों को आश्रय-वन प्रणाली के तहत रखा गया।1896 में राल के लिए एक विभागीय आसवनी स्थापित की गयी। गोरखपुर के अतिरिक्त जहां स्पष्ट कटान प्रणाली अपनायी गयी थी, साल वनों का प्रबंधन 1914 के बाद से आवधिक ब्लॉक के साथ आश्रय-वन प्रणाली के तहत किया जाने लगा। वर्ष 1918 में एक अलग अनुसंधान प्रभाग बनाया गया। 1920 में कार्य योजना सर्किल का गठन किया गया।